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DAHEJ PRATHA EK ABHISHAP

दहेज़ प्रथा एक अभिशाप (DAHEJ PRATHA EK ABHISHAP)

जब जब समाज प्राचीन परम्पराओं के मूल रूप व मूल उद्देश्य से भटका है तब तब सामाजिक परम्पराएँ कुप्रथाओ में परिवर्तित हुआ है | दहेज़ हमारी उन्ही सामाजिक कुप्रथाओं में से एक है | कोई प्रमाणिक तथ्य तो नही है किन्तु संभव है कि प्राचीन में इस परंपरा की शुरुआत सिर्फ इस उद्देश्य से की गयी होगी कि नव दंपत्ति को जीवन आरंभ करने हेतु जिन वस्तुओ की आवश्यकता पड़ती है उसकी व्यवस्था करके उन्हें दी जाये । किन्तु धीरे धीरे मांगने का प्रचलन बढ़ गया और आज यह प्रथा हमारे समाज को दीमक की भांति खा रहा है । दहेज़ हमारे समाज में व्याप्त कुरीतियों में से सबसे बड़ा दानव है दहेज़ हमारे समाज की कुंठित मानसकिता का प्रतीक है । क्या लड़की होना अपराध है ? फिर क्यों कन्या पक्ष को दहेज़ के लिए प्रताड़ित होना पड़ता है ? कभी आपने सोचा कि इस सामाजिक प्रथा से समाज और देश को कितना हानि हो रहा है ? शादी व्याह एक पवित्र बंधन है , जिसमे सिर्फ दो व्यक्तियों का ही मिलन  नही होता बल्कि दो परिवारों और दो संस्कारो का भी मिलन होता है। जब दो परिवार एक हो रहे है तो दोनों का फ़र्ज़ बनता है कि दोने एक  दूसरे के इज़्ज़त की रक्षा करे। किन्तु दहेज़ के लोभ में उल्टा ही चलन है । अक्सर देखा गया है कि वर पक्ष कन्या पक्ष को पूरे समाज के सामने अपमानित करते है । दहेज़ व् लेन-देन में कमी होने की वजह से अक्सर देखा गया है कि कन्या के द्वार से बारात वापस चली जाती है | क्या हम इतने कुटिल और लोभी हो गये है कि सही और गलत में फर्क नही कर सकते ? क्या इन्सान अपने बेटों को इसलिए पाल-पोस कर बड़ा करता है कि एक दिन उसके जरिये किसी लाचार बेटी के बाप के गर्दन पे तलवार रख सके? शिक्षा का फल तो ये होना चाहिए कि इन्सान विनम्र बने किन्तु यहाँ तो उल्टा ही चलन है , लोग जितने ज्यादा शिक्षित है उतनी ही अधिक लालसा है |

किस पैमाने पर ये कहा जाता है कि वर पक्ष कन्या पक्ष से बड़ा होता है । कैसे मान लिया जाये कि पुरुष स्त्री से श्रेष्ठ होता है| दहेज़ लड़की ही क्यों देती है? लड़का दहेज़ क्यों नहीं देता ?   जहाँ एक ओर हम सामाजिक स्त्री -पुरुष के बराबरी की बात करते है वही दूसरी ओर उन्हें नीचा दिखाने में कोई कसर नही छोड़ते | ये हमारी समाजिक विषमता नहीं तो और क्या है? कही एक वाक्य पढ़ा था कि दहेज़ का दर्द उस बाप से पूछो जिसकी जमीन भी चली गयी और बेटी भी । दहेज़ प्रथा की वजह से ही गरीब माँ-बाप बेटियो को बोझ समझते है । भ्रूण हत्या के लिए बहुत हद तक दहेज़ प्रथा भी दोषी है । 

आजकल शादी के लिए जब बात की जाती है तो ऐसा लगता है जैसे किसी व्यापार की बात हो रही है । किसी से पूछिये की शादी के लिए कोई लड़का हो तो बताईये तो आपसे पूछा जाता की कितना पैसा लगाओगे ?   फलां लड़का इंजीनियर है तो ये शादी 10 लाख की पड़ेगी , लड़का डॉक्टर है तो 15 लाख ,   जितना ज्यादा योग्यता उतना ही ज्यादा रेट । ऐसा लगता है जैसे लड़के ने सारी पढ़ाई शादी के लिए ही की थी । कितनी विडम्बना है कि शादी व्याह जैसे पवित्र बंधन को हमने व्यापर बना दिया है । फिर रिश्ते में स्नेह कहा रहा ? शादी के नाम पे जिस लड़की के बाप का गला दबोचा है उस लड़की से भला कैसे उम्मीद करेंगे कि वो आपके परिवार का सम्मान करेगी । 

आइये एक उदहारण से समझते है कि  इस प्रथा से किस प्रकार सामाजिक और आर्थिक हानि हो रही है । मेरी चार बहने है । जीवन के जिस पड़ाव में हम  उत्साह और उमंग से जिन चाहते है , उस उम्र में मेरे पिता जी इस चिंता के बोझ तले दबे रहे कि आखिर कैसे चार चार बेटियों की शादी करूँगा । बहनों की शिक्षा- दीक्षा सिर्फ इसलिए नहीं हो पायी कि पैसे उनके शादी-व्याह के लिए जोड़े जाये या फिर उनके शिक्षा पे खर्च किया जाये । इस परिवेश का बहुत हद तक असर मेरी भी शिक्षा पे पड़ा । जिस धन का उपयोग शिक्षा , स्वास्थ व् बेहतर जीवन के लिए हो सकता था वो इस कुप्रथा के भेंट चढ़ गया । उल्टा हम लोग ऋण की बोझ तले दब गए । ये कहानी सिर्फ मेरी नहीं है , ये कहानी आपकी भी है | आप भी इस कहानी में बराबर के भागीदार है हम सब इस कहानी के पात्र है क्योंकि चाहकर भी आप खुद को समाज से अलग नही कर सकते है | हम कल्पना भी नही कर सकते कि इस प्रथा से कितना हमारा नैतिक और आर्थिक दोनों का पतन हुआ है ।

ना सिर्फ दहेज़ बल्कि शादी-व्याह में फिजूल खर्ची भी हमारे समाज को बहुत पीछे ले जा रहा है । एक शादी में औसतन 5 -6 लाख खर्च हो जाते है ( बात औसतन हो रही है , नही तो एक-एक शादी में लाखो -करोड़ो खर्च करने वाले भी है ) । 40-50 हजार मासिक कमाने वाला इंसान को भी इतने पैसे संचय करने में 4 -5 साल लग ही जायेंगे , 15-20 हजार कमाने वाले से बचत की उम्मीद ही मत कीजिये। आप जरा सोचिये कि इतने सालो की कमाई एक दिन के इस रस्म में खर्च हो जाती है । जिसने 2-3 संतान हो शादी करने के लिए उसके आर्थिक संकट का तो ईश्वर ही मालिक है । अब कल्पना कीजिये कि इस प्रथा से समाज को अगर मुक्ति मिल जाये तो समाज का कितना आर्थिक भला हो सकता है । इस धन से लोग अपना जीवन स्तर सुधार सकते है और सुख की जिंदगी जी सकते है। शादी में जितना धन का अपव्यय होता है अगर वही धन नवदंपति के नाम जमा कर दिया जाये तो वो लोग एक सुखी जीवन जी सकते है 

कुछ वक़्त पहले एक फ़िल्म देख रहा था  "दावते इश्क" ;   उसमे अनुपम खेर अपने बेटी की शादी के लिए पैसे इकठ्ठा कर रहे थे , एक दिन जब उनके बेटी ने निर्णय  लिया कि वह कभी शादी नही करेगी । एक दिन बाप- बेटी ट्रैन में सफर कर रहे थे बेटी प्लेटफार्म पे चिप्स लेने गयी तो कहती है पापा 10 रूपये वाला पैकेट ले लूँ ? तो अनुपम खेर ने कहा , " बेटी बड़ा पैकेट लो अब तुम्हारी शादी करनी नहीं तो किस बात की चिंता" । ये महज एक वाक्य नही था बल्कि हमारे इस सड़ी-गली सामाजिक व्यस्था के दर्द को बयां कर रही था कि कैसे इंसान अपने खुशियों को इस कुरीति के भेट चढ़ा देता है ।

इस मुल्क में शिक्षा  के लिए ऋण लेना जरुरी नही है ; धन के आभाव में लोग निरक्षर ही रह जाते है या फिर उचित रीति से शिक्षा-दीक्षा नही मिल पाती किन्तु शादी के लिए ऋण लेना अनिवार्य है क्योंकि इस रस्म से मुँह फेर कर कोई कोई भी समाज में नक्कू नहीं बनना चाहता है । आप इस सामाजिक परंपरा के निर्वाहन के लिए मजबूर है , चाहे वो अमीर हो या गरीब । शहर हो या गाँव, आमिर हो या गरीब, शिक्षित हो या अनपढ़, दहेज़ के नाम पर सभी की जमात एक है, सभी एक ही घाट पे पानी पी रहे है | यह एक सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया है | जिसको जितना ज्यादा अधिक दहेज़ मिला वो उतना ही ज्यादा समाज में सम्मानीय है | जब कुप्रथा ही सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बन जाये फिर तो भला ये क्यों न फूले-फले ? ये कैसी विडम्बना है समाज की जिसमे इन्सान नैतिक मूल्य खो कर भी सम्मान के योग्य बना रहे |

दहेज़ का ऐसा कुचक्र बन गया है जिसमे सभी जकड़े हुए है , जिस इन्सान ने अपनी बेटी की शादी में दहेज़ दिया वो बेटे की शादी में वसूलने के लिए और भी तत्पर रहता है | आपबीती से भी समाज की आंखे नही खुलती है, बल्कि आपबीती उसे और भी निर्दयी और लालची बना देती है |

ऐसा भी नही है कि इस कुप्रथा के उन्मूलन के लिए समाज ने प्रयास नही किया किन्तु धनाढ्य समुदाय के हाथो ये प्रथा हमेशा पोषित होती रही है | धनाढ्य के लिए शादी- व्याह एक उत्सव होता है , किन्तु गरीब के लिए यह एक सामाजिक विवशता है । दहेज़ लेना-देना कानूनन अपराध है परन्तु स्वेच्छा के नाम पर लेन-देन करके कानूनी विधा को ढेंगा दिखाया जा रहा है | नवशिक्षित समाज से हमेशा यही उम्मीद रहती है कि वे इन सामाजिक वर्जनाओ को तोड़कर एक नए समाज का नींव रखेंगे, इसलिए उम्मीद की जा सकती है इस कुप्रथा का अंत भी इन्ही नवशिक्षितो द्वारा हो |     

होना तो यह चाहिए कि शादी- व्याह धार्मिक रीति से की जाये और नवदंपति को जरुरत के सामान की व्यस्था कन्या और वर पक्ष मिल कर करे ताकि किसी पे अनावश्यक बोझ न पड़े। अगर हम ऐसा करने में सफल रहे तो सही मायने में हम एक स्वस्थ समाज की संरचना कर सकेंगे जहा स्त्रियों का सम्मान होगा , जहां उसे दहेज़ के लिए प्रताड़ित नही किया जायेगा , जहाँ वो सच में एक बहू नहीं बल्कि बेटी बनकर ससुराल में रह पायेगी ।

मुस्कान , एक सामाजिक संस्था , के चैयरमैन " श्री अजय पांडेय जी " और "श्रीमती अभिलाषा जी” वर्षो से दहेज़ के खिलाफ कई तरह के मुहिम चला रहे है । उनकी संस्था "मुस्कान " के द्वारा लोगो को इस प्रथा के खिलाफ जागरूक किया जा रहा है ।  इस संस्था के कार्यकर्ता शहर, गाँव और कस्बो में घूम-घूम कर इसके खिलाफ देशव्यापी अभियान चला रहे है

उनके इस शुभ प्रयास लिए शुभकामनाएं |  

दीपक कुमार

 

 

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